तुम आ गईं
जैसे बंद खिड़की से आ जाती है हवा 
सर्दियों के मौसम में 

कि जैसे छन के आ जाती है धूप
रोशनदान से 
या  कि तेज़ गर्मी में यकायक 
फुहारें चूम लें ,धरती का माथा 

तुम मिल गयीं
कोट की जेब में भूले हुए सिक्को की तरह
 जो सबसे मुश्किल वक्त में काम आते है 

तुम्हारा होना वैसा ही है 
जैसे थकान के बाद कोई दे दे
 
अदरक की गर्म चाय बिना पूछे 
और तुम्हारा जाना 
ये आखिरी मिसरा कभी न लिखा जाए ।।

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